श्री महालक्ष्मी, गणेश एवं कुबेर षोडशोपचार पावन पूजन
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शास्त्रोक्त १८ चरण महालक्ष्मी विधि
06:45 PM – 09:05 PM
स्थिर वृषभ लग्न • स्थायी धन-समृद्धि11:42 PM – 12:28 AM
श्री सूक्त एवं कुबेर मंत्र सिद्धिकार्तिक अमावस्या के पावन दिवस पर क्षीरसागर में समुद्र मंथन के दौरान भगवती महालक्ष्मी का प्राकट्य हुआ। देवी के दिव्य स्वरूप को देखकर समस्त देवता और मुनि नतमस्तक हो गए। माता ने प्रभु श्री नारायण को अपने जीवनसंगिनी रूप में वरण किया। इस दिन दीपमालाएं प्रज्वलित कर माता लक्ष्मी का सत्कार किया जाता है।
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दीपावली महालक्ष्मी-गणेश पूजा की प्रामाणिक षोडशोपचार विधि, प्रदोष काल व स्थिर लग्न मुहूर्त, महालक्ष्मी मंत्र, संपूर्ण कथा और बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न।
दीपावली (दीवाली) सनातन धर्म का सबसे पावन और प्रकाशमय महापर्व है, जो कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को पूरे उल्लास से मनाया जाता है। यह पावन पर्व मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास पश्चात अयोध्या आगमन तथा समुद्र मंथन से भगवती महालक्ष्मी के प्राकट्य का पावन उत्सव है। इस दिन घर-आंगन को स्वर्णमयी मिट्टी के दीपों, सुंदर रंगोली और सुगंधित पुष्पों से सजाकर अज्ञान, दरिद्रता व तिमिर को दूर कर सुख, शांति, सद्बुद्धि और अखण्ड समृद्धि का स्वागत किया जाता है।
दीपावली का आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्व अत्यंत गहरा है। भगवान गणेश और माता लक्ष्मी का संयुक्त पूजन यह संदेश देता है कि धन और समृद्धि (लक्ष्मी) तभी फलदायी और स्थायी होती है जब उसके साथ सद्बुद्धि और विवेक (गणेश) विद्यमान हो; बिना विवेक के धन विपत्ति ला सकता है, जबकि धर्मयुक्त लक्ष्मी यश और कल्याण प्रदान करती है। इस दिन धनाधिपति कुबेर तथा विद्यादायिनी मां सरस्वती का भी आह्वान किया जाता है। दीप प्रज्वलन हमारे अंतर्मन की आत्मज्योति को जाग्रत कर अज्ञान के अंधकार को मिटाने का पावन प्रतीक है।
हे कमल पुष्प पर विराजित भगवती महालक्ष्मी! मुझ पर प्रसन्न होइए, अपनी असीम कृपा बरसाइए। आपको कोटि-कोटि नमन। प्रदोष काल में इस महालक्ष्मी बीज मंत्र का भक्तिपूर्वक जप करने से दरिद्रता का नाश होकर अखंड सुख, यश और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
दीपावली लक्ष्मी पूजन का सर्वश्रेष्ठ समय प्रदोष काल में स्थिर लग्न (विशेषतः वृषभ लग्न) का माना जाता है, जो सूर्यास्त के उपरांत आता है। मान्यता है कि स्थिर लग्न में की गई पूजा से महालक्ष्मी घर में स्थिर वास करती हैं। इसके अतिरिक्त मध्यरात्रि का निशिता काल श्रीसूक्त पाठ और तंत्र-मंत्र साधना हेतु विशेष फलदायी होता है।
विकल्प: अशोक के पत्ते व सुपारी
विकल्प: शुद्ध दूध अथवा निर्मल गंगाजल
विकल्प: उपलब्ध ताजे सुगंधित पुष्प
विकल्प: स्वच्छ सिक्का या पूजा की सुपारी
विकल्प: लाल कलावा या चुनरी
विकल्प: करतल ध्वनि एवं जयघोष
दीपावली की पावन कथा सनातन परंपरा के कई दिव्य प्रसंगों को अपने में समेटे हुए है। इसमें सर्वप्रमुख मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का लंकापति रावण का वध कर चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात अपनी पावन नगरी अयोध्या में पुनरागमन है। जब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ अयोध्या पधारे, तो समस्त नगरवासी अपार हर्ष और भक्ति से झूम उठे। कार्तिक मास की घोर अंधियारी अमावस्या की रात्रि को अयोध्यावासियों ने करोड़ों घी के दीपक जलाकर पूरी नगरी को अलौकिक प्रकाश से जगमगा दिया। अयोध्या की वह दीपावली धर्म की विजय और 'राम राज्य' के शुभारंभ का अमर पर्व बन गई। इसके साथ ही पौराणिक मान्यता है कि जब देवताओं और दानवों ने अमृत प्राप्ति हेतु क्षीरसागर का मंथन (समुद्र मंथन) किया था, तब कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन ही भगवती महालक्ष्मी स्वर्णिम आभा के साथ कमल पुष्प पर प्रकट हुई थीं। माता लक्ष्मी ने भगवान श्री हरि विष्णु का वरण किया और संपूर्ण सृष्टि को सुख, ऐश्वर्य और शांति का वरदान दिया। अतः दीपावली प्रकाश की अंधकार पर विजय, धर्म की अधर्म पर विजय और मां महालक्ष्मी व श्री गणेश जी के दिव्य आशीर्वाद का महापर्व है।