जन्माष्टमी
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माखन चोर कथा

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जन्माष्टमी पूजा विधि, महत्व, कथा और मंत्र

जन्माष्टमी पूजा की प्रामाणिक विधि, मुहूर्त, मंत्र, सम्पूर्ण व्रत कथा और बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न।

जन्माष्टमी पर्व का परिचय

जन्माष्टमी भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण के जन्म का पर्व है, जो भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में हुआ था। यह भारत में सबसे व्यापक रूप से मनाए जाने वाले त्योहारों में से एक है, जिसे दिनभर के व्रत, भजन-कीर्तन, मध्यरात्रि आरती और झांकियों तथा दही हांडी उत्सवों के माध्यम से श्रीकृष्ण के जन्म के पुनःअभिनय के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार चंद्र पंचांग के अनुसार सामान्यतः अगस्त या सितंबर में पड़ता है, इस वर्ष की सटीक तिथि और मुहूर्त पंचांग पृष्ठ पर देखी जा सकती है।

धार्मिक महत्व व भक्ति योग

जन्माष्टमी केवल एक जन्मोत्सव ही नहीं, बल्कि अधर्म पर धर्म की विजय का स्मरण भी है। मथुरा की जेल में देवकी और वसुदेव के घर, राजा कंस के अत्याचार के बीच श्रीकृष्ण का जन्म, सबसे अंधकारमय परिस्थितियों में भी आशा के आगमन का प्रतीक है। माना जाता है कि यह व्रत रखने से पूर्व कर्मों का शुद्धिकरण होता है, समृद्धि आती है और भक्ति योग — भक्ति के मार्ग — से गहरा जुड़ाव बनता है। कई भक्त परिवार की रक्षा, बाधाओं के निवारण और ज्ञान की प्राप्ति के लिए भी यह व्रत रखते हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण को बाल गोपाल के रूप में और भगवद्गीता के ज्ञानदाता के रूप में, दोनों रूपों में पूजा जाता है।

"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"
Om Namo Bhagavate Vasudevaya

निशिता काल व मुहूर्त समय

सबसे महत्वपूर्ण समय निशिता काल है — मध्यरात्रि की वह अवधि जिसे श्रीकृष्ण के जन्म का सटीक समय माना जाता है। यह समय अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग के अनुसार प्रत्येक वर्ष थोड़ा बदलता है। इस वर्ष के सटीक निशिता काल और आपके स्थान के लिए अष्टमी तिथि के आरंभ-समाप्ति समय हेतु लाइव पंचांग देखें।

संपूर्ण पूजा सामग्री सूची

12 सामग्री
🛕
भगवान श्रीकृष्ण / लड्डू गोपाल की प्रतिमा या चित्र
🪵
पूजा चौकी और स्वच्छ कपड़ा
🏺
कलश और शुद्ध जल/गंगाजल मिश्रित जल
🥛
पंचामृत: दूध, दही, घी, शहद, मिश्री, गंगाजल

विकल्प: अभिषेक हेतु दूध या शुद्ध जल

🌿
अक्षत (साबुत चावल), चन्दन, केसर, तुलसी पत्र

विकल्प: केसर और तुलसी दल

👘
भगवान के लिए नए पोशाक

विकल्प: मौली (कलावा)

🪔
धूप / अगरबत्ती, घी का दीपक और कपूर
🧈
माखन, आरती की थाली

विकल्प: मावा पेड़ा, खीर अथवा मिश्री

🌸
नारियल, आम के पत्ते, पुष्प, पुष्प मालावैकल्पिक

विकल्प: ताजे उपलब्ध पुष्प

🪶
मुकुट, मोरपंख, झूला / हिंडोलावैकल्पिक

विकल्प: सुंदर पुष्प श्रृंगार

🔔
शंख, घंटीवैकल्पिक

विकल्प: करतल ध्वनि (ताली) अथवा जयघोष

🍇
छप्पन भोग / अतिरिक्त नैवेद्यवैकल्पिक

विकल्प: ऋतु फल अथवा घर का बना मिष्ठान्न

श्रीकृष्ण जन्म संपूर्ण व्रत कथा

बहुत समय पहले मथुरा के राजा कंस अत्यंत अत्याचारी थे। एक आकाशवाणी में यह भविष्यवाणी हुई थी कि उनकी बहन देवकी की आठवीं संतान उनके वध का कारण बनेगी, जिसके भय से उन्होंने देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया। इस भविष्यवाणी से बचने के लिए कंस ने देवकी की प्रत्येक संतान को जन्म लेते ही मार डाला। जब आठवीं संतान के जन्म का समय आया, तो सम्पूर्ण नगरी एक विचित्र, गहरी निद्रा में डूब गई और कंस के आदेश के बावजूद कारागार के प्रहरी भी सो गए। ठीक मध्यरात्रि में, गरज और वर्षा के बीच, श्रीकृष्ण का जन्म हुआ — श्याम वर्ण, मानो वर्षा के बादल के समान, और दिव्य तेज से युक्त, जिन्होंने क्षणभर के लिए अपने माता-पिता को अपना चतुर्भुज रूप दिखाया, फिर एक साधारण शिशु का रूप धारण कर लिया। कारागार की बेड़ियां स्वयं टूट गईं और भारी द्वार बिना किसी आवाज़ के खुल गए। वसुदेव, यह समझते हुए कि यह कोई साधारण शिशु नहीं है, नवजात को एक टोकरी में सिर पर रखकर उफनती यमुना नदी पार कर गोकुल की ओर चल पड़े। नदी का जल उन्हें मार्ग देने के लिए विभाजित हो गया, और महान शेषनाग ने वर्षा से रक्षा हेतु उनके पीछे छत्र बनकर साथ दिया। वे गोकुल पहुंचे, जहां उनके मित्र नंद और पत्नी यशोदा के घर उसी रात एक पुत्री का जन्म हुआ था। वसुदेव ने रात के अंधेरे में दोनों शिशुओं की अदला-बदली कर दी — श्रीकृष्ण को यशोदा-नंद के पास छोड़ा और उस कन्या को लेकर वापस कारागार लौट आए। जब कंस इस आठवीं संतान को भी मारने आया, तो वह कन्या योगमाया देवी के रूप में प्रकट हुई और उसे चेतावनी दी कि उसका असली शत्रु पहले ही सुरक्षित होकर कहीं और पल रहा है। इस प्रकार श्रीकृष्ण गोकुल और वृंदावन में यशोदा-नंद के स्नेहपूर्ण पालन में, कंस की पहुंच से दूर, बड़े हुए और बाद में लौटकर भविष्यवाणी को पूर्ण किया तथा मथुरा को अत्याचार से मुक्त किया। जन्म की यह रात्रि — संकट, तूफान, नदी का विभाजन और सुरक्षित स्थान तक की यह मौन यात्रा — वही है जिसे हर जन्माष्टमी पर भक्त मध्यरात्रि में पुनः जीते हैं।

नियम व सावधानियां (क्या करें और क्या न करें)

क्या करें (Do's)

  • Keep the mind focused on Krishna bhajans and stories through the day
  • Break the fast only after the midnight aarti and abhishek
  • Offer panchamrit and makhan-mishri as bhog
  • Decorate a cradle (jhula) for the idol if observing at home

क्या न करें (Don'ts)

  • Avoid grains during a strict nirjala or phalahar vrat, depending on the type chosen
  • Avoid consuming tulsi leaves directly — they are offered but traditionally not chewed
  • Avoid non-satvik food and alcohol on this day
  • Avoid breaking the fast before the Nishita Kaal (midnight) ceremony is complete

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

हां, लेकिन सामान्यतः निर्जला व्रत की बजाय फलाहार व्रत की सलाह दी जाती है, और व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए डॉक्टर से परामर्श लेना उचित है।

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