दिवस १ (९ में से)
माँ शैलपुत्री

माँ शैलपुत्री पूजन

"वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥"

शुभ मुहूर्त11:49 AM – 12:37 PM
01घं
:
34मि
:
05से
१. शुभ रंग
Orange
२. पावन भोग
गाय का शुद्ध घीव मिश्री प्रसाद
३. प्रिय पुष्प
सफेद मोगराव चमेली पुष्प

माँ शैलपुत्री पूजा विधि

वैदिक मंत्रोच्चार व चरणबद्ध पूजन विधान

8 चरण

संकल्प एवं गणपति स्मरण

पूर्व या उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। अपने दाहिने हाथ में थोड़ा जल, अक्षत और पुष्प लें तथा संकल्प करें — अपना नाम, आज की तिथि व परिवार के मंगल हेतु नौ दिवसीय नवरात्रि पूजन का संकल्प बोलें। संकल्प पूर्ण होने पर जल व अक्षत किसी थाली या भूमि पर अर्पित करें। किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश का स्मरण करें: ॐ गं गणपतये नमः

मिट्टी बोना (जौ रोपण)

चौड़े मिट्टी या तांबे/स्टील के पात्र में स्वच्छ मिट्टी फैलाएं और उसमें जौ के बीज बोएं। ऊपर से थोड़ा जल छिड़कें। इस पात्र को पूरे नौ दिन कलश के पास रखा जाता है — नवमी तक अंकुरित जौ घर में सुख-समृद्धि व संपन्नता का पावन प्रतीक माना जाता है।

कलश की स्थापना

अति-महत्वपूर्ण

१. मिट्टी या धातु के कलश को लगभग तीन-चौथाई स्वच्छ जल से भरें और थोड़ा गंगाजल मिलाएं। २. जल में सुपारी, सिक्का, अक्षत व दूर्वा घास डालें। ३. कलश के मुख पर आम के पाँच पत्ते मुकुट की भांति सजाएं। ४. नारियल को लाल कपड़े (चुनरी) में लपेटकर कलश के मुख पर स्थापित करें। ५. कलश के कंठ पर गायत्री मंत्र बोलते हुए मौली (रक्षा सूत्र) बांधें: ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् (यदि मंत्र ज्ञात न हो तो 'ॐ' का उच्चारण करते हुए मौली बांध सकते हैं) ६. तैयार कलश को जौ के पात्र के ऊपर या उसके समीप पूजा स्थल के केंद्र में स्थापित करें।

अखंड ज्योति की स्थापना

कलश के समीप शुद्ध घी या तेल का अखंड दीपक प्रज्वलित करें। यह दीपक नौ दिन निरंतर प्रज्वलित रखने का विधान है — इसे सुरक्षित स्थान पर रखें और समय-समय पर घी/तेल की जांच करते रहें ताकि यह बुझे नहीं। दीप प्रज्वलित करते समय मन में यह भाव रखें कि यह ज्योति नवरात्रि पर्यंत आपके घर में माँ भगवती की अखंड उपस्थिति का साक्षात रूप है।

माँ शैलपुत्री का आवाहन

कलश या प्रतिमा में माँ शैलपुत्री की पावन उपस्थिति का आवाहन करें। कलश की ओर पुष्प व अक्षत अर्पित करते हुए उनके ध्यान मंत्र का पाठ करें: वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥ इसके पश्चात पूजन पर्यंत माँ के सरल मंत्र का जप करते रहें: ॐ शैलपुत्र्यै नमः

षोडशोपचार पूजा (सरल विधि)

पूर्ण षोडशोपचार में १६ औपचारिक उपचार होते हैं; अधिकांश गृहस्थ आवश्यक उपचारों का सरल अनुष्ठान करते हैं। प्रत्येक सामग्री अर्पित करने से पूर्व 'ॐ शैलपुत्र्यै नमः' बोलें: • आसन — देवी के लिए स्वच्छ आसन या वस्त्र • जल/पंचामृत स्नान — कलश के आधार पर थोड़ा जल या पंचामृत अर्पित करें • वस्त्र — लाल चुनरी या वस्त्र अर्पण • रोली-कुमकुम-हल्दी — कलश/प्रतिमा पर तिलक लगाएं • अक्षत — साबुत चावल अर्पित करें • पुष्प — ताजे पुष्प अर्पित करें • धूप — अगरबत्ती या धूप प्रज्वलित कर दिखाएं • दीप — छोटा दीपक प्रज्वलित कर आरती की तरह घुमाएं • नैवेद्य (भोग) — आज का विशेष भोग: शुद्ध गाय का देसी घी • पान-सुपारी — तांबूल (पान व सुपारी) अर्पित करें • दक्षिणा — सांकेतिक दक्षिणा स्वरूप सिक्का अर्पित करें

मंत्र जाप एवं पाठ

रुद्राक्ष या कमलगट्टे की माला लेकर नवार्ण मंत्र या माँ शैलपुत्री के मंत्र का १०८ बार (या समयानुसार) जप करें: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे इसके उपरांत श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ (यदि आपके कुल में नौ दिनों में पूर्ण पाठ की परंपरा हो) अथवा श्री दुर्गा चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ करें।

आरती एवं प्रसाद

पूजन का समापन दिव्य आरती से करें — आरती की थाली में कर्पूर प्रज्वलित करें, घंटी बजाते हुए कलश व माँ की प्रतिमा के सम्मुख 'जय अम्बे गौरी' अथवा कुल-परंपरा अनुसार दुर्गा आरती करें। इसके उपरांत आज के पावन भोग (शुद्ध गाय का घी अथवा उससे निर्मित मिष्ठान) को सपरिवार प्रसाद स्वरूप ग्रहण व वितरित करें।

नवदुर्गा परिक्रमा • ९ पावन स्वरूप

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